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Thursday, August 16th, 2018

अनुच्छेद 35(ए) और हमारा कश्मीर

अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनजर हम एेसे कोलाहल में फंसते जा रहे हैं जिससे भारत की जनता के मूलभूत मुद्दे रोजाना खिसक कर किसी एेसे आवरण में ढक सकें जिनका सम्बन्ध सीधे तौर पर भारत की उस मजबूत आन्तरिक बनावट से न होकर एेसी दिखावटी बनाई गई तस्वीर से हो जिसे देखकर हम सन्तोष कर सकें कि हम एक हैं। भारत की मजबूती की पहली शर्त यह है कि इसके विभिन्न राज्य भी स्वयं में आर्थिक व सामाजिक तौर पर मजबूत हों और इनके लोग अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप तरक्की और विकास करके भारत को मजबूत बना सकें। यह बेवजह नहीं है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वतन्त्र भारत को राज्यों का संघ (यूनियन आफ इंडिया) इस तरह बनाया कि हर प्रदेश को अपनी स्थानीय भौगोलिक, सांस्कृतिक व सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने लोगों के विकास की राह तय करने की स्वतन्त्रता मिल सके। इसी वजह से संविधान में केन्द्रीय, समवर्ती व राज्य सूची बनाई गई इनमें भी कृषि, शिक्षा व स्वास्थ्य को राज्य सूची का भाग मूलतः बनाया गया था जिससे इन क्षेत्रों में राज्य के लोगों का विकास में उनकी प्रतिभा का पूरा उपयोग हो सके। बाद में शिक्षा को समवर्ती सूची में डाला गया मगर यह सोचना मूर्खता होगी कि स्वतन्त्र होने पर विभिन्न देशी राजे-रजवाड़ों ने अपनी रियासतों का भारतीय संघ में विलय करने के लिए सरदार पटेल से कोई सौदेबाजी नहीं की थी। मैसूर रियासत का विलय तो 14 अगस्त 1947 को ही हो पाया था। रजवाड़ों को सन्तुष्ट करने के लिए ही संविधान में विशेष अनुच्छेद 371 का प्रावधान किया गया था। बाद में इसमें संशोधन करके विभिन्न धाराओं के तहत देश के 11 राज्य लाये गए। इनमें महाराष्ट्र व गुजरात जैसे राज्य तक आते हैं। कुछ में तो वहां के स्थानीय लोगों के अपने समाज के फौजदारी व सम्पत्ति कानूनों में सरकार को किसी प्रकार की दखलन्दाजी करने तक का अधिकार नहीं है। इनमें नागालैंड व मिजोरम सबसे ऊपर आते हैं। सिक्किम भी एेसा राज्य है जिसका विधिवत विलय 1974 में होने पर अनुच्छेद 371 में ही धारा जोड़ कर सुनिश्चित किया गया कि इस राज्य के भारत में विलय होने से पहले जो सामाजिक व फौजदारी कानून थे वे यथावत लागू रहेंगे मगर इन सभी राज्यों के बनने पर समय-समय पर संविधान में संशोधन करके अनुच्छेद 371 में नई धाराएं जोड़ कर इन्हें लागू किया गया जबकि जम्मू-कश्मीर रियासत के मामले में 26 अक्टूबर 1947 को जब इसका भारतीय संघ में विलय हुआ तो अनुच्छेद 370 का प्रस्ताव संविधान का हिस्सा महाराजा की शर्तों के तहत विशेष परिस्थितियों में बना क्योंकि तब जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से थोड़ी ही दूर पाकिस्तानी फौजें रह गई थीं और तब तक खुद को स्वतन्त्र रखने वाले जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ का हिस्सा बनने का यह स्वर्ण अवसर था। अतः भारत ने महाराजा हरिसिंह की प्रार्थना पर अपनी फौजें भेज कर पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया। महाराजा की यह भी शर्त थी कि उनकी रियासत के भारतीय संघ का हिस्सा बनने पर इसके प्रधानमन्त्री पद पर शेख अब्दुल्ला को ही रखा जाये और वह स्वयं सदरे रियासत होंगे। इसके बाद 1949 की आखिरी तिमाही में जम्मू-कश्मीर रियासत के विशेष दर्जे को बरकरार रखने पर प्रधानमन्त्री पं. नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच बातचीत हुई जो अनुच्छेद 370 से निर्देशित होता था मगर सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि जम्मू-कश्मीर रियासत की रियाया ब्रिटिश साम्राज्य की रियाया नहीं थी बल्कि वह महाराजा की प्रजा थी। वस्तुतः अंग्रेजों ने भारत को आजादी देते समय जो रास्ता अपनाया था उसके तहत भारत का विभाजन दो स्वतन्त्र देशों हिन्दोस्तान और पाकिस्तान में करके इनमें मौजूद 756 नवाबी व राजसी रियासतों को उनकी सत्ता लौटाई गई थी। इनमें से 576 रियासतें भारत के दायरे में आती थींं और बाकी पाकिस्तान में। अतः महाराजा ने जब भारत को आजादी मिलने के बाद अपनी रियासत का भारत में विलय किया तो इसमें राजसी द्वारा बनाये गये सभी कायदे कानून लागू थे केवल रक्षा, विदेश व दूरसंचार के महकमें भारत सरकार के पास रहने थे। इस सूबे में 1927 में ही महाराजा ने कानून बना दिया था कि राज्य में बाहर के लोग जमीन-जायदाद नहीं बना सकते हैं। इसकी मांग राज्य की पंडित प्रजा की तरफ से ही 1912 से तब उठनी शुरू हुई थी जब अंग्रेजों ने कश्मीर की हसीन वादियों में अपने बंगले बनाने शुरू कर दिये थे। आर्थिक व प्रशासनिक रूप से सशक्त पंडित प्रजा ने तब यह आन्दोलन चलाया था कि ‘कश्मीर-कश्मीरियों के लिए’ इस पर महाराजा ने यह कानून बनाया था। इसी वजह से इस राज्य में गौ हत्या पर भी 1862 से प्रतिबन्ध लागू था जिसे महाराजा के शासन ने ही उस वर्ष लागू किया था। अतः अनुच्छेद 370 के वादे के मुताबिक इस राज्य के लोगों पर लागू आनुवां​िषक नागरिकता के आधार पर नागरिकता तय करते हुए जमीन-जायदाद का अधिकार लागू होना था। इसके लिए जम्मू-कश्मीर के स्थायी नागरिकों को तय करने का अधिकार राज्य की सरकार के हाथ में दिया जाना जरूरी था जिसके लिए मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से अनुच्छेद 35 (ए) संविधान में जोड़ा गया जिससे अनुच्छेद 370 की शर्तों पर पालन हो सके। क्योंकि अनुच्छेद 370 संसद द्वारा पारित किया गया दस्तावेज नहीं था अतः इसे संवैधानिक रूप से पूर्णतः खरा रखने के लिए राष्ट्रपति ने मई 1954 में आदेश जारी किया, इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि जम्मू-कश्मीर का जो पृथक संविधान होगा वह इसकी तसदीक करते हुए अपनी विधानसभा को इसमें संशोधन या रद्दोबदल करने का अधिकार देगा। यही वजह है कि जब 1965 में पाकिस्तान आक्रमण से कुछ समय पहले सूबे के प्रधानमन्त्री को मुख्यमन्त्री व सदरे रियासत को राज्यपाल कहा जाने लगा था तो इस आशय का प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर विधानसभा में ही पारित किया गया था। अतः चीजें बिल्कुल शीशे की तरह साफ हैं। जम्मू-कश्मीर की बेमिसाल खूबसूरती कायम रखने के लिए जो कानून 1927 में महाराजा ने बनाया था उसकी प्रासंगिकता मौजूदा दौर में और भी ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि हमने अपने हिमाचल व उत्तराखंड जैसे खूबसूरत पहाड़ी राज्यों को कंक्रीट का जंगल बना कर छोड़ दिया है। धार्मिक स्थलों को हमने ‘पिकनिक स्पाट’ में बदल डाला है जिसका प्रमाण कुछ साल पहले केदारनाथ में आयी प्रलय है। भारत में आज जिस तरह बिल्डर लाबी हर राजनैतिक पार्टी को चुनावी चन्दों से मालामाल कर रही है वह तो कश्मीर में इसका स्तर बदलते ही इस तरह टूटेगी कि धरती के इस स्वर्ग को ‘नरक’ में तब्दील करने में पांच साल का समय भी नहीं लेगी ? अभी कम से कम कश्मीर की वादियों की प्राकृतिक सुन्दरता तो बची हुई है और कश्मीर-कश्मीरियों का तो है। बेशक यह मामला फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है और विद्वान न्यायाधीश ही अनुच्छेद 35(ए) की संवैधानिकता की व्याख्या कर सकते हैं परन्तु इतना तय है कि कश्मीर और नागालैंड के मामलों में ज्यादा फर्क नहीं है। नागालैंड को 1962 में ठीक वही रियायतें दीं गईं जो कश्मीर को इससे पहले विशेष परिस्थितियों में दी गई थीं। इसके बाद सिक्किम को भी हमने इसकी विशेषता बनाये रखने की गरज से एेसी ही रियायतें दीं। हालांकि ये रियायतें अनुच्छेद 371 के तहत दी गईं। अतः संसद के वर्षाकालीन सत्र के दौरान यदि यह मुद्दा उठता है तो ठोस तर्कों और तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए, हवाबाजी नहीं।

Source : manish sharma

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