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Sunday, November 18th, 2018

बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के व्यापार को खत्म करने के लिए रच रही है षड्यंत्र

विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत के विशालकाय खाद्य उपभोक्ता बाजार को अपने कब्जे मैं लेने के लिए किस तरह भारत की ही कानून-व्यवस्था के तहत इसके बनाये गये नियमों का इस्तेमाल अपने उत्पादित माल से बाजारों को पाटने में कर सकती हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएसआई) है। इसने सिफारिश की है कि खाद्य पदार्थों मैं मिलावट करने वालों को उम्रकैद की सजा और दस लाख रुपए तक का जुर्माना होना चाहिए और खाद्य पदार्थों में मिलावट की जांच करने वाले इंस्पेक्टरों के काम में बाधा पहुंचाने वालों के लिए छह महीने से दो साल की कैद व पांच लाख रुपए तक का जुर्माना होना चाहिए। ये नियम लागू होते ही भारत के सभी प्रान्तों में छोटे-मोटे खाद्य उत्पादन करने वाली इकाइयों पर ताला ठुक जायेगा और लाखों भारतीय हुनरमन्द कारीगर बेरोजगार हो जायेंगे तथा इसके चलते समूची स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बहुत आसानी के साथ बहुराष्ट्रीय व बड़ी भारतीय कम्पनियों का कब्जा हो जायेगा। खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के नाम पर जिस तरह भारत के घरेलू खाद्य उद्योग को बाजार से बाहर करने की तरकीब भिड़ाई जा रही है वह इस क्षेत्र के लाखों करोड़ रुपए से भी अधिक के कारोबार को बड़ी कम्पनियों को सौंपने का एेसा रास्ता है जिसके बारे में छोटे कस्बों और गांवों में काम करने वाले कारीगर या दुकानदार न तो सोच सकते हैं और न ही उनमें प्राधिकरण के मानकों के अनुसार अपनी उत्पादन इकाइयों का आधुनिकीकरण करने की क्षमता है। यह चोर दरवाजे से भारत के बाजारों में पीजा और बर्गर संस्कृति को बढ़ावा देकर भारतीय व्यंजनों के कारोबार को बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ में देने का तरीका है। पंजाब के अमृतसरी कुल्चे से लेकर छोले-भटूरे और प. बंगाल के रसगुल्ले से लेकर उत्तर प्रदेश व राजस्थान के स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाई नमकीन को बड़ी कम्पनियों की पेकेज्ड नमकीन से बाहर का रास्ता दिखाने की तरकीब है। सबसे खतरनाक यह है कि भारत के शहरों से लेकर गांवों तक में अपने हुनर के बूते पर खाद्य पदार्थों का उत्पादन करने वाले कारीगरों के धन्धे चौपट होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसकी वजह यह है कि किसी भी छोटी दुकान पर खाद्य इंस्पेक्टर का डर ही उसे धंधा करने से रोकने के लिए काफी होगा। इसके परिणाम स्वरूप गांवों से लेकर शहरों तक में केवल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों या बड़ी देशी कम्पनियों के उत्पादों का राज स्वतः कायम हो जायेगा, वैसे भी भारत के लगभग सभी इलाकों में हलवाइयों की दुकानों पर ब्रांडेड नमकीन के पैकेटों ने जगह बना ली है। कुछ राज्य जरूर एेसे हैं जहां स्थानीय ब्रांड के रूप में उत्पाद चलते हैं मगर उनके मालिकाना हक भी बड़े-बड़े धन्ना सेठों के पास हैं। छोटे कारीगरों द्वारा अपना धन्धा खुद शुरू करने के अवसर पहले ही बहुत सीिमत हो चुके है, अब नये कानून के बन जाने पर ये सभी हुनरमन्द लोग या तो मजदूरी करने को मजबूर हो जायेंगे अथवा रिक्शा चलायेंगे या शहरों में जाकर घरेलु चाकरी करेंगे। दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और बड़ी कम्पनियों के हाथ बहुत बड़ा बाजार आ जायेगा और वे अपने उत्पादों की कीमत का मनमाना मूल्य वसूलने के लिए स्वतन्त्र होंगी। तर्क दिया जा सकता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुकाबला भारतीय कम्पनियों ने भी बहुत दिलेरी के साथ किया है जिसमें पेप्सी कम्पनी की लहर भुजिया का मुकाबला हल्दी राम की भुजिया से हुआ मगर इस युद्ध में भारत के लाखों स्थानीय नमकीन कारीगरों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा जो छोटे स्तर पर नमकीन बनाते थे। किसी छोटे शहर में कम पूंजी से अपनी आइसक्रीम की फैक्ट्री लगाने वाला किस तरह बड़े-बड़े ब्रांड की आइसक्रीम का मुकाबला कर सकेगा? अभी तक उसे इस बात का फायदा मिल जाता था कि बड़े ब्रांड की आइसक्रीम की उत्पादन इकाई दूर होने से उसका दूरदराज के इलाके में परिवहन या लदान मुश्किल होता था मगर नये नियमों के तहत अब इन्हीं ब्रांडों की उत्पादन इकाइयां खुलेंगी अथवा उनके परिवहन की व्यवस्था होगी। कोई सोच भी नहीं सकता कि छोटे स्तर पर कारोबार शुरू करने वाला व्यक्ति प्राधिकरण के मानकों का पालन किस तरह करेगा। समोसे बनाने वाला किस तरह इन मानकों पर खरा उतरने की कोशिश कर सकता है। यहां तक कि पकोड़े तल कर पेट पालने वाला व्यक्ति किस तरह खाद्य इंस्पेक्टर की तलवार को झेल पायेगा? क्या कभी सोचा गया है कि भारत के महानगरों और बड़े शहरों को छोड़कर दूध का व्यापार कौन लोग करते हैं। यह व्यापार छोटे-छोटे पशुपालकों के हाथ में है जो दुधारू पशु पाल कर उनका दूध बाजार में बेच कर अपना परिवार पालते हैं। वे किस तरह खाद्य इंस्पेक्टरों का सामना कर सकते हैं। उनके सामने एक ही विकल्प रह जायेगा कि वे किसी बड़े धन्ना सेठ की डेयरी में अपना दूध उसके निर्धारित मूल्य पर बेचें और झंझट से मुक्ति पायें। यह बताने की जरूरत ही नहीं है कि अब गांवों तक में लेमनजूस व बिस्कुट का कारोबार बड़ी-बड़ी कम्पनियों के हाथ में पहुंच चुका है क्योंकि छोटे-छोटे उद्योग लगाकर इनका उत्पादन करने वालों में सरकारी मानकों का अनुपालन करने की क्षमता ही नहीं है। एक प्रकार से यह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ी कम्पनियों की बन्धक बनाने की विधि है जिसे कानूनी जामा बड़े यत्न से पहनाया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत के आम व सामान्य आदमी की आर्थिक शक्ति को हम बड़ी-बड़ी कम्पनियों के पास गिरवी किस तरह रख सकते हैं? दुनिया में एेसे बहुत से उदाहरण हैं जहां आर्थिक उदारीकरण के नाम पर एेसे प्रयास असफल कर दिये गये हैं। नाइजीरिया जैसे देश में जर्मनी से पीजा सप्लाई किया जाता था मगर वहां के लोगों ने इसे असफल कर दिया क्योंकि इससे उनके स्थानीय धंधे चौपट होने लगे थे। विकास का यह तरीका केवल बड़ी कम्पनियों के ही और फलने-फूलने का मार्ग बनाता है। स्वास्थ्य सुरक्षा के नाम पर हम घरेलू आर्थिक ताकत को रहन नहीं रख सकते लेकिन दूसरी तरफ खाद्य पदार्थों में मिलावट एक गंभीर समस्या है। इससे निपटने के वे रास्ते हमें अख्तियार करने पड़ेंगे जो यूरोपीय देशों में ही हैं। नगरपालिका या नगर पंचायत स्तर पर इस समस्या से निपटा जा सकता है और इस प्रकार हल निकाला जा सकता है कि खाद्य पदार्थों की शुद्धता बरकरार रहे मगर इसके नाम पर हम भारत में बेरोजगारी बढ़ा कर सामान्यजन की उद्यमशीलता समाप्त नहीं कर सकते। 2006 में जो खाद्य मानक कानून बना था उसे 2011 में अधिसूचित किया गया था। इसके बाद उच्चतम न्यायालय का फैसला आने के बाद खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए जिस तरह के प्रावधान प्राधिकरण ने सुझाये वे भारत की जमीनी और आर्थिक वास्तविकता के एकदम उलट हैं। इनका कड़ा विरोध होना चाहिए।
Source : Manish sharma

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