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Saturday, November 17th, 2018

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से भारतीय अर्थव्यवस्था डावांडोल

डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार गिरने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने गिरती अर्थव्यवस्था का मैसेज लोगों में गलत नहीं जाए इसलिए जीएसटी के 1 वर्ष पूर्ण होने पर समाचार पत्रों एवं टीवी चैनलों पर इस तरह की खबरें प्रकाशित करवाई की सरकार ने अर्थव्यवस्था को नया स्वरूप दिया है ।डालर के मुकाबले भारतीय मुद्रा रुपए का गिरता मूल्य अब चिन्ताजनक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में सरकार द्वारा जो दावे किये जा रहे हैं उनमें नारेबाजी ज्यादा और हकीकत कम है। डालर के मुकाबले रुपए की कीमत अब 69 रु. के पास पहुंच गई है जिसका असर बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में भारतीय उद्योगों पर विपरीत ही पड़ेगा। फरवरी-मार्च 2014 में जब रुपए की डालर के मुकाबले विनिमय दर 58 रु. से ऊपर निकल गई थी तो आज की सत्तारूढ़ पार्टी ने कोहराम मचा दिया था और कहा था कि यह सब केन्द्र मंे सत्ता पर काबिज मनमोहन सिंह सरकार की लकवाग्रस्त नीतियों का परिणाम है और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारत की गिरती साख का प्रमाण है परन्तु पिछले चार साल में यदि रुपया डालर के मुकाबले दस रुपए सस्ता हो गया है तो यह किस तथ्य का प्रतीक माना जायेगा? रुपया अब एेसे संजीदा मुहाने पर आकर बैठ गया है जहां से और गिरने पर विदेशी निवेशकों में बेचैनी हो सकती है और वे पूंजी बाजार में निवेशित अपने धन को बाहर निकालने की रणनीति बना सकते हैं।रुपए के सस्ता या डालर के महंगा होने से भारत के आयात पर उलटा असर पड़ता है और जिससे आमजन सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं वह पेट्रोलियम पदार्थ होता है। पेट्रोल व डीजल के भाव जिस तरह भारत में आसमान छू रहे हैं उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि रुपया इसी तरह कमजोर बना रहा तो भारत के उपभोक्ताओं को महंगा पेट्रोल ही खरीदना पड़ेगा। बेशक भारत के खजाने में 400 अरब डालर से अधिक की विदेशी मुद्रा के मौजूद होने की बात कही जाती हो मगर इसका अधिकांश हिस्सा ‘पार्किंग मनी’ का ही है अथवा विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भेजे गये धन (रेमीटेंसेज) का है। जहां तक व्यापार करके अर्थात निर्यात कारोबार से कमाई गई विदेशी मुद्रा का सवाल है वह लगातार घट रही है जबकि आयात में खर्च की जाने वाली विदेशी मुद्रा की मात्रा बढ़ रही है। इसका प्रमाण यह है कि वर्ष 2017-18 में निर्यात जहां 9.8 प्रतिशत बढ़ा वहीं आयात 20 प्रतिशत बढ़ा, इससे व्यापार घाटा बढ़कर 153 अरब डालर से ज्यादा का हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने जितनी विदेशी मुद्रा निर्यात करके कमाई उससे बहुत ज्यादा आयात करके खर्च कर डाली जबकि इससे पिछले वर्ष 2016-17 में इसका व्यापार घाटा 105 अरब डालर का रहा था।विदेश व्यापार में लगातार बढ़ता घाटा विश्व बाजार में इसकी आर्थिक ताकत को बताता है जिसका सीधा सम्बन्ध इसकी मुद्रा से होता है। संसद के रिकार्ड को निकाल कर देखा जाये तो हमें ज्ञात होगा कि किस तरह भारतीय मुद्रा के मजबूत होने पर निर्यातकों की तरफ से होहल्ला किया गया था। मनमोहन सिंह की पहली सरकार में जब श्री कमलनाथ वाणिज्य मन्त्री थे तो डालर के मुकाबले रुपए की कीमत 40 रु. के आसपास घूम रही थी और उस समय संसद में सवाल उठाया गया था कि भारत के निर्यातकों के हित को ध्यान में रखते हुए रुपए को कुछ ढीला किया जाये। क्योंकि निर्यात से हुई डालर आय भारत में आने पर रुपयों में ज्यादा होगी। इसका जवाब जो श्री कमलनाथ ने दिया था उसे मैं उद्धृत करता हूं। उन्होंने कहा था कि मजबूत मुद्रा किसी भी देश की आर्थिक स्थिति की मजबूती का प्रमाण होती है। खुली बाजार अर्थव्यवस्था में मुद्रा की विनिमय दर बाजार की शक्तियां तय करती हैं और वे आर्थिक मानकों से प्रभावित होती हैं।अतः रुपये का मजबूत होना भारत की आर्थिक ताकत को ही दर्शाता है लेकिन पिछले कुछ वर्षों से रुपये की कीमत लगातार गिरने के बावजूद हम यह राग अलापने में जरा भी हिचक नहीं दिखा रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है। यदि यह मजबूत है तो इसका इजहार चौतरफा होना चाहिए और इस प्रकार होना चाहिए कि औद्योगिक क्षेत्र से लेकर कृषि व सेवा क्षेत्र मंे मजबूती दिखाई दे मगर पिछले चार सालों में रुपये की कीमत दस रुपये गिरने का मतलब होता है कि भारत की आर्थिक ताकत में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है मगर डालर के लगातार महंगा होने की एक वजह और है जो प्रायः सुप्त ही रहती है। यह है सोने के कारोबार में लगे व्यापारियों की बढ़ती मुनाफाखोरी। भारत में सोने की खपत पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा होती है। डालर की मांग इस वर्ग के व्यापारियों की गैर सरकारी क्षेत्र में सर्वाधिक मानी जाती है क्योंकि लगभग 900 टन से ज्यादा सोना भारत प्रतिवर्ष आयात करता है। डालर जितना महंगा होता जायेगा घरेलू बाजार मंे सोना भी उतना ही महंगा होता जायेगा और यह पूंजी को मृत निवेश के रूप में खाता जायेगा। यह एेसा चक्रव्यूह है जिस पर सरकार को लगातार निगाह रखनी होती है। अतः रुपए की कीमत के आयाम देश की आर्थिक विविधता से ही जुड़े हुए होते हैं।

Source : Manish sharma

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