ग्वालियर
प्रदेश में पुरुष नसबंदी का लक्ष्य पूरा नही होने पर खड़ा हुआ विवाद अभी थमा नही है। इस मामले में अब एक नया खुलासा हुआ है। पुरुष नसबंदी के लिए किए जाने वाले जागरूकता कार्यक्रमों को 9 साल से बजट ही नहीं मिला है। असल में साल 2011 में मप्र पुरुष नसबंदी के मामले में पूरे भारत में नंबर एक के स्थान पर था। तब 45726 पुरुष नसबंदी के आॅपरेशन हुए थे, लेकिन अब ऐसा नही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ग्वालियर के राज्य स्वास्थ्य एवं प्रबंधन संस्थान में संचालित प्रदेश के एनएसवी(नो स्केलपल वेस्कटॉमी) रिसोर्स सेंटर को साल 2012 से आज तक बजट ही नहीं मिला है।

इस कारण पुरुष नसबंदी को लेकर किए जाने वाले जागरूकता कार्यक्रम और आशा कार्यकर्ताओं के ट्रेनिंग प्रोग्राम तक ठप पड़ चुके है। इसके चलते प्रदेश के कई जिलों में ग्राउंड वर्क ही नहीं हो पाया। नतीजतन 9 साल में पुरुष  नसबंदी का आंकड़ा घटते-घटते ढाई हजार पर सिमट गया है। गौरतलब है कि दो दिन पहले मध्य प्रदेश में पुरुष नसबंदी का लक्ष्य पूरा नहीं होने पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति और दूसरी कड़ी कार्रवाई का आदेश सरकार को वापस लेना पड़ा था। विवाद बढ़ने पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की प्रदेश संचालक छवि भारद्वाज को भी पद से हटाया गया था।

एनएसवी रिसोर्स सेंटर द्वारा पिछले वर्ष 46 लाख रुपए के बजट की डिमांड की गई थी। इस बजट के जरिए प्रदेश के ऐसे कमजोर जिलों मेंं ग्राउंउ वर्क करने की बात कही गई थी जहां पुरुष नसबंदी का प्रतिशत बहुत कम है, लेकिन यह बजट अब तक नही दिया गया। वहीं साल 2013-14 में रिसोर्स सेंटर को 31.40 लाख रुपए स्वीकृत भी हुए थे। बावजूद इसके यह राशि कई बार पत्राचार करने के बाद भी नहीं मिली।