मुंबई

खचाखच भरी लोकल ट्रेनों की भीड़ कम करने के लिए पिछले कई सालों से जद्दोजहद चल रही है। सरकारें योजनाएं बनाती हैं, जो अपनी ही रफ्तार में पूरी हो रही है। मुंबई लोकल का बोझ कम करने के लिए पहले कभी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, जो अब मुंबई मेट्रो प्रॉजेक्ट्स के रूप में हो रही है। वैसे, मुंबई लोकल में यात्रा करने वाले लोगों को पैटर्न की बात करें, तो कुछ रोचक आंकड़े सामने आ रहे हैं। मुंबई लोकल में यात्रा करने वाले लगभग 80 लाख यात्रियों में 20-22 प्रतिशत ऐसे भी हैं, जो 6-10 किमी की यात्रा करने के लिए लोकल का सहारा लेते हैं। जबकि, दस किमी की दूरी के लिए बेस्ट, टैक्सी या फिर साइकल का सहारा लिया जा सकता है।

आनेवाले कल के लिए साइकल विकल्प?
डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन की तस्वीरें देखकर दिल खुश हो जाता है, जहां कारों से कई गुना साइकलें सड़कों पर हैं। मुंबई को शंघाई नहीं, कोपेनहेगन बनाने की जरूरत है। जहां लोग काम पर जाने के लिए साइकल का उपयोग करें। वैसे, पिछले कई सालों से मुंबईकरों को साइकल पर सवार करने के जिद्द से फिरोजा सुरेश हर उस सरकारी महकमें के चक्कर लगा रही हैं, जो पॉलिसी या टाउन प्लानिंग में दखल रखता हो। फिरोजा बताती है, 2023 तक मुंबई में एक लाख साइकल वाले होने चाहिए, जो इसका इस्तेमाल परिवहन के तौर पर करें। वैसे, मुंबई में 5-6 हजार डिब्बा वाले और छोटे मोटे सामान की सप्लाई साइकल से करने वालों ने मुंबई को भारत की साइकल कैपिटल बनाने की उम्मीद जगाई है।


कैसे बनेगी मुंबई साइकल कैपिटल
स्मार्ट कम्यूट फाउंडेशन के जरिए फिरोजा पिछले कुछ सालों से ऐसे लोगों को प्रमोट कर रही हैं, जो घर से दफ्तर तक साइकल से सफर करते हैं। फिरोजा बताती हैं कि कुछ साल पहले जुहू से दादर आने के लिए वो शेयरिंग ऑटो रिक्शा, लोकल ट्रेन और बस का उपयोग करती थी। इसमें कभी-कभी सवा घंटा लग जाता था। एक दिन रिक्शा की लाइन से तंग आकर उन्होंने साइकल उठा ली। यकीन मानिए 45 मिनट में अपने जुहू के घर से दादर के दफ्तर पहुंच गई। फिरोजा बताती है कि मुंबई एक दुशा में चलने वाला शहर है, इसलिए सड़क पर ट्रैफ‌िक बहुत रहता है। इस ट्रैफिक में सभी वाहनों की औसत गति दूसरे शहरों के मुकाबले कम होती है। फिरोजा कहती है कि यहां दूसरे वाहनों की स्पीड से साइकल चलाने वालों को कोई खतरा नहीं है। खतरा बस गड्ढों से है। इन्हें सुधारा जाए, तो यह शहर साइकल चलाने लायक बन सकता है।

अपनाना होगा ब्राजील पैटर्न
मुंबई को साइकल फ्रेंडली बनाने के लिए BMC और राज्य सरकार को कई पैटर्न बनाए गए। BKC में अलग से साइकल ट्रैक भी बनाया गया, लेकिन सही प्लानिंग के अभाव में आज उसका उपयोग नहीं हो रहा है। फिरोजा बताती हैं कि प्रशासन को कई सुझाव दिए गए हैं, इनमें से सबसे उपयोगी होगा साउलो-पोलो (ब्राजील पैटर्न)। इस शहर में सड़क के बीचो-बीच साइकल चलाने वालों के लिए डेडिकेटेड स्थान दिया गया है। ठीक वैसा ही, जैसा अहमदाबाद और सूरत से सरकारी बसों के लिए डेडिकेटेड कॉरिडोर बनाया गया है। फिरोजा बताती हैं कि मुंबई में सड़क की बीच में जो बड़े-बड़े डिवाइडर बनाए गए हैं, वहां साइकल के लिए कॉरिडोर बनाया जा सकता है। मेट्रो वन के नीचे वाली जगह पर साइकल के लिए कॉरिडोर बनाया जा सकता है।

ब्राजील में बनाया गया है साइकल चलानेवालों के लिए कॉरिडोर
वर्ष 2014-15 में साउलो पोलो स्थानीय प्रशासन द्वारा 230 किमी का डेडिकेटेड साइकलिस्ट कॉरिडोर बनाया गया। इसके बाद 2016 में सर्वे हुआ जिसमें पता चला कि जो 76 प्रतिशत लोग पहले सुरक्षा के कारण साइकल नहीं चला रहे थे, उनमें से 60 प्रतिशत लोगों ने डेडिकेटेड कॉरिडोर बनने के बाद साइकल को कम्यूट का साधन बना लिया।

मुंबई में क्या हो रहा है
1. BMC द्वारा जल्द ही मुंबई में पब्लिक शेयरिंग आधार पर साइकल योजना की शुरुआत की जा रही है। निजी कंपनी किराए पर साइकल देगी, जिसका उपयोग ऐप के जरिए होगा। इसके लिए साइकल स्टैंड चिन्हित करने का काम चल रहा है।

2. मुंबई में साइकल पार्किंग के लिए कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन द्वारा जगह चिन्हित की जा रही हैं। काला-घोड़ा में ऐसी ही एक जगह है, जहां साइकल पार्क की जा सकती है। भविष्य में BMC के पार्किंग स्थलों पर 5 प्रतिशत जगह साइकल वालों के लिए आरक्षित की जाएगी।

3. भविष्य में मुंबई मेट्रो में साइकल वालों के लिए स्थान होगा। मेट्रो के रेक में साइकल रखने की जगह आरक्षित की गई है। इससे साइकल टू वर्क करने वालों के लिए आसानी होगी। वैसे, फोल्डिंग साइकल अगर आपके पास हों, तो आप मुंबई लोकल में भी इस साइकल को साधारण डिब्बे में लगेज के तौर पर ले जा सकते हैं।