नई दिल्ली
दिग्गज विजेंदर सिंह के बाद भारतीय पुरुष मुक्केबाजी को जिस चेहरे की तलाश थी वह अमित पंघाल के रूप में पूरी हो गई। हरियाणा के 23 वर्षीय पंघाल भले ही विश्व चैंपियन बनने से चूक गए, लेकिन 45 साल के इतिहास में विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचकर उन्होंने नई इबारत लिख डाली।

विजेंदर ने 10 साल पहले कांसा जीतकर जो शुरुआत की थी, अमित ने उससे एक कदम आगे जाकर भारतीय मुक्केबाजी को फिर नई उड़ान दे दी। 2017 एशियाई चैंपियनशिप में 49 किग्रा वर्ग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक के रूप में अपना पहला पदक जीतने वाले अमित दो साल में ही भारतीय मुक्केबाजी के नए पोस्टर ब्वॉय बन गए।

एशियाई खेलों और एशियाई चैंपियन अमित अब टोक्यो ओलंपिक में देश की पदक की सबसे बड़ी उम्मीद बन गए हैं। विजेंदर 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांसा जीतने वाले देश के एकमात्र पुरुष मुक्केबाज हैं। अब अमित से ओलंपिक में भी विजेंदर से आगे जाने की उम्मीद की जा रही है। उन्होंने मात्र आठ माह में अपने नए 52 किग्रा भार वर्ग में यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर ली।

अमित के इस प्रदर्शन से भारत ओवर ऑल प्रदर्शन में कनाडा को पीछे छोड़कर 40वें नबर पर पहुंच गया। भारत के विश्व चैंपियनशिप में एक रजत और पांच कांस्य सहित कुल छह पदक हो गए हैं।

अमित पंघाल (52 किग्रा) का कहना है कि उन्हें व्यक्तिगत सम्मान नहीं चाहिए, लेकिन वह चाहते हैं कि उनके पूर्व कोच अनिल धनकड़ को सम्मानित किया जाए। अर्जुन पुरस्कार के लिए उनके नाम की अनदेखी की गई क्योंकि 2012 में चिकन पाक्स के उपचार के लिए ली गई दवाई से वह डोपिंग उल्लंघन कर बैठे थे। डोपिंग परीक्षण में विफल होने के कारण उन पर एक साल का प्रतिबंध भी लगा था।

उन्होंने कहा, ‘मैं पुरस्कारों की परवाह नहीं करता लेकिन मुझे खुशी होगी अगर मेरे पूर्व कोच धनकड़ के नाम पर द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए विचार किया जाए। मैंने 2008 में मुक्केबाजी शुरू की थी और धनकड़ सर तब से मेरे लिए अहम बने रहे हैं। उन्हें पुरस्कार मिलने का मतलब मुझे पुरस्कार मिलना होगा। बल्कि मुझे ज्यादा खुशी होगी।’

भारतीय सेना के नायब सूबेदार पंघाल पिछले दो वर्षों से शानदार फॉर्म में हैं। उन्होंने 49 किग्रा से 52 किग्रा में वजन वर्ग में खेलने का फैसला किया लेकिन इस बदलाव के बावजूद उनके प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ा। अब वह अगले साल फरवरी में चीन में होने वाले एशियाई ओलंपिक क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में भाग लेंगे। उन्होंने कहा, ‘यह एक और चुनौती है और मैं इसमें बेहतर करने की कोशिश करूंगा।’

45 वर्षीय धनकड़ कभी भी किसी राष्ट्रीय टीम से नहीं जुड़े हैं लेकिन जब वह मुक्केबाज थे तो राष्ट्रीय स्तर के पदकधारी थे। उन्होंने अपने शिष्य के इस लगाव के बारे में कहा, ‘मैं 2005 से उसे जानता हूं। मेरे लिए वह परिवार की तरह है। मैं उसके परिवार वालों से काफी करीब हूं और वह मेरे बच्चे की तरह ही है।’