नई दिल्ली 
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से ओबीसी की 17 जातियों को एससी वर्ग में शामिल करने के फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा दी. हाई कोर्ट ने इस मसले पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है. हाई कोर्ट ने योगी सरकार से कहा कि प्रदेश सरकार को इस तरह का फैसला लेने का अधिकार नहीं है. सिर्फ संसद को ही एसटी/एससी जातियों में बदलाव करने का अधिकार है.

उत्तर प्रदेश में इन 17 जातियों को पिछड़ा वर्ग से अनुसूचित जाति में शामिल करने की कोशिशें पिछले दो दशक से होती रहीं हैं. पूर्ववर्ती बसपा और समाजवादी पार्टी सरकारें भी यह कोशिशें कर चुकी हैं. मगर राज्य सरकार के अधिकार से बाहर जाकर फैसला लेने के चलते इसका क्रियान्वयन नहीं हो सका.

हाल में  योगी सरकार ने 24 जून को शासनादेश जारी कर 17 जातियों को फिर से ओबीसी से अनुसूचित जाति में शामिल करने की व्यवस्था की. जिलों के डीएम को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र जारी करने का आदेश भी दे दिया गया. मगर हाई कोर्ट की ओर से रोक लगाए जाने के बाद अब इन 17 जातियों का मामला फिर से भंवर में लटक गया है.

इस मामले की हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राजीव मिश्र की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए ये आदेश दिया है. कोर्ट ने सरकार के फैसले को गलत माना है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह के फैसले लेने का अधिकार सरकार को नहीं था.

कौन-कौन हैं जातियां
ये पिछड़ी जातियां निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, धीमर, मांझी, तुरहा, गौड़ इत्यादि हैं. इन पिछड़ी जातियों को अब एससी कैटेगरी की लिस्ट में डाला गया था. सरकार ने जिला अधिकारी को इन 17 जातियों के परिवारों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया था, जिस पर हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है.