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Tuesday, November 20th, 2018

धारा 377: सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिकता पर बहस, जज ने कहा- प्रकृति और विकृति का सहअस्तित्व

नई दिल्ली 
समलैंगिकता को अपराध से बाहर किया जाए या नहीं, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस चल रही है। गुरुवार को बहस के दौरान जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि प्रकृति और विकृति का सहअस्तित्व है। उन्होंने कहा कि कई प्रकार के जीवों में सेम सेक्स इंटरकोर्स देखने को मिलता है। उधर, इस मामले में वकील श्याम दीवान ने कहा है कि अब समय आ गया है कि कोर्ट अनुच्छेद 21 के तहत राइट टूट इंटिमेसी को जीवन जीने का आधिकार घोषित कर दे। आपको बता दें कि बुधवार को केंद्र सरकार ने धारा 377 पर कोई स्टैंड न लेकर फैसला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दिया। अडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से कहा कि हम 377 के वैधता के मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ते हैं, लेकिन अगर सुनवाई का दायरा बढ़ता है, तो सरकार हलफनामा देगी। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पांच जजों की बेंच सुनवाई कर रही है। 

गुरुवार को जब संविधान पीठ के सामने इसकी सुनवाई शुरू हुई तो जजों की टिप्पणी भी सामने आई। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि अपने सेक्शुअल ओरिएंटेशन की वजग से LGBT कम्युनिटी के लोगों को सेमी अबर्न और सेमी रूरल इलाकों में स्वास्थ्य सेवा हासिल करने में गैरबराबरी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि परिवार के दबाव की वजह से गे शख्स को शादी करनी पड़ती है और यह उनके बाइ सेक्शुअल होने की वजह हो सकता है। जस्टिस ने कहा कि सेम सेक्स रिलेशनशिप के अपराध होने की वजह से, इसके कई अन्य प्रभाव पड़ते हैं। 

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि नेचर में प्रकृति और विकृति का सहअस्तिव है। ऐसे हजारों जीव हैं जो सेम सेक्स इंटरकोर्ट करते हैं। इसपर अडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिंदू दार्शनिक ग्रंथों में प्रकृति और विकृति के सहअस्तित्व की बात दार्शनिक और आध्यात्मिक संदर्भ में की गई है। उन्होंने कहा कि इसे सेक्शुअलिटी और होमोसेक्शुअलिटी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। 

पांच जजों की संविधान पीठ के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मेंटल हेल्थकेयर ऐक्ट के तहत संविधान ने किसी के सेक्शुअल ओरिएंटेशन की वजह से उसके साथ गैरबराबरी को निषेध करता है। सीनियर ऐडवोकेट और पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई ने संवैधानिक बेंच से कहा कि होमोसेक्शुअलिटी भारतीय संस्कृति के लिए ऐलियन नहीं बल्कि प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति का हिस्सा है। 
 

Source : agency

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