वाराणसी
उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर, गलियों का शहर और घाटों का शहर. घाटों का नजारा गंगा नदी की धारा ने बदल दिया है. जो घाट चंद रोज पहले तक बनारस के घाटों पर अठखेलियां करतीं मोक्षदायिनी गंगा की लहरों के अद्भुत दृश्य का दीदार करने के लिए पहुंचे सैलानियों से गुलजार रहा करते थे, वहां आज केवल जल ही जल है.

घाटों का नजारा बदल  गया है. दशाश्वमेध और हरिश्चंद्र घाट पर होने वाली गंगा आरती घरों की छतों पर हो रही है. वहीं महाश्मसान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर शवदाह स्थल भी जलमग्न हैं. इसके कारण शवदाह घाट की बजाय घाट के समीप गलियों में हो रहा है. शव लिए अंत्येष्टि के लिए पहुंच रहे लोगों को अपनी बारी के लिए घंटों लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ रही है.

गलियों में शवदाह, इलाकाई परेशान

घाट जलमग्न होने के कारण गलियों में हो रहे शवदाह के कारण धुंए से इलाकाई परेशान हैं. घाट के आसपास रहने वाले उन नागरिकों को विशेष समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जो श्वास रोग से ग्रसित हैं. काफी संख्या में लोग अपना घर छोड़कर अन्यत्र चले गए हैं. इस तरह की समस्या के पीछे तकनीकी खामी के कारण है. हरिश्चंद्र घाट पर गैस आधारित शवदाह प्रणाली के लिए लगाए गए सिस्टम में आई खराबी को अब तक दुरुस्त न किए जाना भी इसका एक कारण है.

प्रशासन पर लापरवाही का आरोप

स्थानीय नागरिकों और डोम समुदाय के लोगों ने शवदाह में हो रही समस्या के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है. डोम समुदाय के पवन चौधरी ने कहा कि स्थानीय प्रशासन शवदाह के लिए ऊंचे प्लेटफार्म का निर्माण करने में विफल रहा है. उन्होंने प्रशासनिक लापरवाही को इसके लिए जिम्मेदार बताया और कहा कि ऐसा तब है, जब ऊंचे प्लेटफार्म का निर्माण कराने के लिए वर्षों पहले मंजूरी के साथ फंड भी जारी हो चुका है.