Friday, August 17th, 2018

रामकथा के चलते सीख ली शब्दभेदी बाण चलाने की कला

 रायपुर
 जंगलों और पहाड़ों से भरे छत्तीसगढ़ में यूं तो बाण चलाने वाले बहुत हैं मगर शब्दभेदी बाण ! ...जी हां, 96 बरस के कोदूराम वर्मा आज की तारीख में भी आंखों पर पट्टी बांधकर सनसनाते बाण से सामने लक्ष्य को भेद देने में माहिर हैं।

ऐसे हुई थी शुरुआत

राजधानी रायपुर से महज 22 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम भिंभौरी निवासी कोदूराम रामायण और रामकथा सुनने के लिए श्रोताओं को आमंतित्र करने हेतु नाटक किया करते थे। अंतत: एक कथावाचक की सलाह पर उन्होंने धनुष-बाण उठा लिया। नाटक के साथ-साथ तीर चलाने की कला का प्रदर्शन लोगों को भाने लगा। धीरे-धीरे कोदूराम वर्मा ने आंखों पर पट्टी बांधकर निशाना साधना शुरू किया।

लंबा वक्त लगा, मगर वो हासिल हुआ, जिसके लिए वो तपस्या कर रहे थे। उन्होंने शब्दभेदी बाण चलाने में महारथ हासिल की। उनके इस अद्भुत प्रयास के चलते उन्हें कई राजकीय सम्मान भी प्राप्त हुए। हालांकि उन्हें मलाल है कि उनके लाख प्रयास के बाद भी कोई दूसरा अब तक इस कला में पारंगत न हो सका।

लोग कहते हैं बाण देवता : उम्र जब 96 वर्ष हो तो अच्छे अच्छों के हाथ-पांव कांपने लगते हैं मगर कोदूराम वर्मा की बात ही अलग है। एकलव्य की तरह उन्होंने भी शब्दभेदी बाण चलाने को अपना एकमेव लक्ष्य रखा और उसे हासिल भी किया। उनका कोई गुरु नहीं था। जो सीखा, खुद ही सीखा। आप भिंभौरी से दूर के गांवों में भी कोदूराम वर्मा के बारे में पूछेंगे तो लोग बड़े सम्मान से उनके बारे में बताएंगे। गांव वाले उन्हें प्यार से बाण देवता कहते हैं।

खास धनुष-बाण, लोग हैरत में...

कोदूराम वर्मा जिन धनुषों का प्रयोग करते हैं वो पक्की लकड़ी का होता है। इसे वो बेहद जतन से आकार देते हैं, इसमें वक्त लगता है। तीर तैयार करने के लिए वो बहेलिया पद्धति का इस्तेमाल करते हैं जिसमें तीर के शीर्ष पर तीखा लघु भाला होता है। कोदूराम वर्मा बताते हैं, प्रत्यंचा कितनी खिंची होनी चाहिए, यह भी अनुभव से सीखा जाता है। इसे घुट्टी बनाकर पिलाया नहीं जा सकता। आज कोदूराम वर्मा की हैरतअंगेज तीरंदाजी देखकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं।

मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित : प्रतिभा छिपती नहीं। कोदूराम वर्मा की भी कीर्ति चारों ओर गूंजने लगी। अंतत: 2004 में उन्हें छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के दौरान सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने भी उनका सम्मान किया। हालांकि कोदूराम वर्मा कहते हैं, लोग अब सीखना नहीं चाहते, मेरे बेटे व शिष्य भी नहीं। प्रयास करके इन लोगों ने बाण चलाना तो सीख लिया मगर शब्दभेदी ! ...ना बाबा ना, कोई नहीं सीख सका।

ऐसे चलाते हैं शब्दभेदी बाण

गांव का परिवेश होने के कारण साबुन की टिकिया में पतली सी लकड़ी को गाड़ दिया जाता है। इसके बाद वहां मौजूद एक साथी दो लकड़ियों को आपस में ठोंक-ठोंककर आवाज पैदा करता रहता है। उस आवाज को सुनकर आंखों पर पट्टी बांधे कोदूराम वर्मा उस पतली लकड़ी (टहनी) पर अचूक निशाना लगाते हैं। बाण का फल लकड़ी को फाड़ते या प्रहार स्थल से तोड़ते हुए आगे निकल जाता है। कोदूराम कहते हैं, यह लंबे प्रयास का फल था। जैसे बूंद-बूंद से घड़ा भरता है वैसे ही दिन प्रतिदिन के अभ्यास से यह विद्या सीखी।

Source : Agency

संबंधित ख़बरें

आपकी राय

11 + 4 =

पाठको की राय