मुंबई

महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने समीकरण बनाने शुरू कर दिए हैं. बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है. वहीं, विपक्ष भी एकजुट होने की कवायद में जुट गया है. राज ठाकरे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बगावती रुख अख्तियार किए जाने बाद उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) की कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में एंट्री की सुगबुगाहट तेज हो गई है. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस-एनसीपी-एमएनएस तीनों मिलकर क्या बीजेपी-शिवसेना के विजय रथ को रोक पाएंगे?

लोकसभा चुनाव के पहले भी गठबंधन में शामिल होने की थी चर्चा

बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान एनसीपी ने राज ठाकरे को गठबंधन में शामिल करने का प्रस्ताव रखा था. राज ठाकरे की अजित पवार के साथ लगातार मुलाकातें और शरद पवार के साथ बढ़ती नजदीकियां गठबंधन की ओर इशारा कर रही थीं. लेकिन कांग्रेस के अशोक चव्हाण और संजय निरुपम जैसे उत्तर भारतीय नेताओं के विरोध के चलते एमएनएस की गठबंधन में एंट्री नहीं हो सकी. अब राज ठाकरे और सोनिया गांधी की दिल्ली में हुई मुलाकात से दोबारा इस गठबंधन की अटकलें तेज हो गई हैं.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बालासाहेब थोराट ने संगमनेर में पत्रकारों से बात करते हुए कहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में सभी सामान्य विचाराधारा वाली पार्टियों को साथ लेकर चुनावी मैदान में उतरेंगे. ऐसे में कांग्रेस की नजर एमएनएस और प्रकाश अंबेडकर की पार्टी पर है. एमएनएस को लेकर थोराट ने कहा था कि कांग्रेस नेताओं से चर्चा कर इस विषय पर सकारात्मक तरीके से विचार कर रहे हैं. ऐसे में अगर सब ठीक रहा तो इस बार महागठबंधन में एमएनएस की एंट्री हो सकती है.

कांग्रेस ने किया था विरोध

दिलचस्प बात यह है कि एमएनएस की एंट्री का कभी विरोध करने वाली कांग्रेस अब कमजोर होने के बाद एक मजबूत विपक्ष बनाने के लिए सामान्य विचारों वाली पार्टियों को एक साथ लेने की दिशा में विचार कर रही है. हालांकि राज ठाकरे शिवसेना से अलग होने के बाद कोई खास प्रभाव महाराष्ट्र की राजनीति में स्थापित नहीं कर सके हैं. मौजूदा समय में राज ठाकरे अपने सियासी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में राज ठाकरे गठबंधन में शामिल होते हैं तो उन्हें संजीवनी मिलेगी.

शहरी इलाकों में कांग्रेस-एनसीपी को होगा फायदा

मौजूदा समय में शहरी भागों में कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन मजबूत नहीं है. वहीं, एमएनएस की जो भी ताकत बची है वो केवल मुंबई, पुणे, ठाणे और नासिक जैसे शहरों में ही है. एमएनएस को साथ लेने से कांग्रेस-एनसीपी को शहरी इलाको में फायदा की संभावना है. सूत्रों की मानें तो अगर एमएनएस की कांग्रेस-एनसीपी में एंट्री होती है तो गठबंधन को 25 विधान सभा सीटों पर सीधा फायदा हो सकता है. वहीं दूसरी वजह है शिवसेना-बीजेपी के शहरी इलाको के मराठी वोट बैंक में सेंधमारी करना. अब देखना  है कि तीनों के बीच पक रही खिचड़ी क्या गुल खिलाती है.