सिखों के छठें गुरु हरगोबिंद सिंह जी थे। नानक शाही पंचांग के अनुसार इस वर्ष गुरु हरगोबिंद जी की जयंती 18 जून को मनाई जाएगी। उन्‍होंने ही सिख समुदाय को सेना के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित किया था। सिखों के गुरु के रूप में उनका कार्यकाल सबसे अधिक था। उन्‍होंने 37 साल, 9 महीने, 3 दिन तक यह जिम्मेदारी संभाली थी।हरगोबिंद साहिब जी का जन्म 21 आषाढ़ (वदी 6) संवत 1652 ( 19 जून, 1595) को अमृतसर के वडाली गांंव में गुरु अर्जन देव के घर हुआ था।

मुगल बादशाह जहांगीर ने उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें व 52 राजाओं को अपनी कैद से मुक्ति दी थी। उनके जन्मोत्सव को ‘गुरु हरगोबिंद सिंह जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रम सहित गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया जाता है। गुरुद्वारों में लंगर का आयोजन किया जाता है। उनकी जयंती के अवसर पर हम उनके जीवन से जुड़ी अन्‍य खास बातों के बारे में बताएंगे।

जीवन परिचय
गुरु हरगोबिंद सिंह का जन्‍म अमृतसर के वडाली गांव में माता गंगा और पिता गुरु अर्जुन देव के यहां 21 आषाढ़ (वदी 6) संवत 1652 को हुआ था। सन् 1606 में ही उन्‍हें 11 साल की उम्र में गुरु की उपाधि मिल गई। उनको अपने पिता और सिखों के 5वें गुरु अर्जुन देव के द्वारा यह उपाधि मिली थी। गुरु हरगोबिंद सिंह जी को सिख धर्म में वीरता की नई मिसाल करने के लिए भी जाना जाता है। वह अपने साथ सदैव मीरी तथा पीरी नाम की दो तलवारें धारण करते थे। एक तलवार धर्म के लिए तथा दूसरी तलवार धर्म की रक्षा के लिए। मुगल शासक जहांगीर के आदेश पर गुरु अर्जुन सिंह को फांसी दे दी गई तब गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने सिखों का नेतृत्‍व संभाला। उन्होंने सिख धर्म में एक नई क्रांति को जन्म दिया जिस पर आगे चलकर सिखों की विशाल सेना तैयार हुई।